Wednesday, 19 March 2014

"राजनीती में युवा शक्ति "


2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार सबसे अधिक युवा मतदाता भाग लेंगे। चुनाव आयोग के मुताबिक पहली बार दस करोड़ लोग अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। चुनाव आयोग कोई भी आकड़ा जारी नहीं करता कि देश में कितने वोटर हैं ,लेकिन उसने इस बार यह बताया कि पांच साल में नए वोटरों में 18 ,19 साल वालो कि संख्या कितनी हैं। 

भारत के युवाओं का तेजी से राजनीती कि तरफ झुकाव बढ़ा है ,इनमें  से ज्यादा ऐसे युवा हैं। जो राजनीती में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं , या निभाने की सोच रहे हैं। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों  में युवाओं ने अपने मताधिकार का सबसे अधिक इस्तेमाल किया जिस वजह से मतदान का प्रतिशत  भी बढ़ा है। 

युवाओं को जगाने का काम अन्ना आन्दोलन ने बखूबी किया ,भ्रस्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल के लिए अन्ना का आन्दोलन दिल्ली में हुआ।जिससें  लाखों  युवा जुड़े ,देश का हर नौजवान उस आंदोलन का गवाह बना।16 दिसंबर 2013 में दिल्ली गैंगरेप ने युवाओं को फिर  से सड़क पर उतरने को मजबूर कर दिया। इस घटना के बाद लाखों  युवक -युवतियां  दिल्ली कि सड़कों पर "निर्भया "के लिए इंसाफ कि लड़ाई लड़ने को फिर एकजुट हुए ,इसके बाद आम आदमी पार्टी युवाओं  को राजनितिक मंच देने में कामयाब हुई। 

दिल्ली में आम आदमी पार्टी का उदय भी युवाओं  के जोश का परिणाम हैं, दिल्ली में आम आदमी पार्टी को सबसे ज्यादा युवाओ का 17 ,18 फीसदी मत प्राप्त हुआ। जिससे यह सवाल उठना लाजमी हैं। 
आखिर युवाओं  ने आम आदमी पार्टी को ही इतनी तरजीह क्यों दी ? 

शायद इसलिए क्योंकि  आम आदमी पार्टी ने युवाओं  को राजनीती में आने का और अपनी भूमिका निभाने का मौका दिया। पार्टी ने सोशल मीडिया का व्यापक इस्तेमाल किया जिससे प्रभावित  हो कर बड़ी संख्या में युवा इस पार्टी से जुड़े। आम आदमी पार्टी अपने उठाए मुद्दों कि बदौलत युवाओं को अपनी और खींचने में कामयाब रही। जिसमें भ्रस्टाचार ईमानदारी , महँगाई ,पानी महिला सुरक्षा अहम मुद्दे थें। 

राजनितिक पार्टियां युवाओं का इस्तेमाल चुनाव प्रचार या पार्टी के कार्यों में करती रही हैं ,लेकिन जब बात चुनाव लड़ने की आती हैं  तो कम अनुभव का हवाला दिया जाता है। लेकिन अब की  बार यह बदलाव नजर आ रहा है ,बड़ी राजनितिक पार्टियां भी अपने से युवाओं को जोड़ने का काम कर रही हैं। अब सभी दलों को पता चल चुका है।युवाओं कि उपेक्षा करके आप आगे नहीं बढ़ सकते हैं। इसलिए सभी बड़ी पार्टियां युवाओं को अपने साथ जोड़ने का काम कर रही है ,साथ ही सोशल मीडिया का भी जम कर इस्तेमाल करती हैं।

नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी युवाओं से सीधा संवाद कर रहे हैं। बड़े नेता
कॉलेज विशवविद्यालय में युवाओं को सम्बोधित कर रहे हैं। राजनीती में बड़ा बदलाव युवा शक्ति कर सकता है ,क्योंकि अब सभी को पता चल चुका है, कि युवा शक्ति के बिना देश का विकास सम्भव नहीं वो इसलिए क्योंकि आज का युवा कल का भविष्य हैं।
——सुगंधा झा

Monday, 17 March 2014

रंगों का त्यौहार होली


होली रंग विरंगा मस्ती भरा त्यौहार हैं। 

इस दिन लोंग अपने सारे  गीले शिकवे भुलाकर एक दूसरे को गुलाल लगाते हैं ,साथ ही गले मिलते हैं। फाल्गुन मास की  पूर्णमासी को यह त्यौहार बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता हैं। होली के साथ अनेक पौराणिक  कथाएँ जुड़ी हुई हैं। होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है।  

होलिका नाम कि एक राक्षसी थी,जिसे भगवान  शिव से वरदान प्राप्त था कि अग्नि  उसे जला नहीं सकती। 
लेकिन उसनें  अपने वरदान का दुरूपयोग किया। होलिका के भाई हिरण्यकश्यप का पुत्र था प्रहलाद जो भगवान         विष्णु का परम भक्त था, जिससे हिरण्यकश्यप प्रहलाद से नफरत करता था साथ ही उसे मरना चाहता  था। उसने अपनी बहन होलिका को आज्ञा दी कि वह प्रह्लाद को अपनी गौद में बिठा कर अग्नि में जला दें। लेकिन भगवान  विष्णु की  कृपा से प्रह्लाद तो बच गया किन्तु होलिका जल कर भस्म हो गई।  शिवजी ने होलिका को आशीर्वाद दिया ,तब से होलिका दहन पर्व के रूप में मनाया जाने लगा ,साथ ही शिव ने कहा कि  उस भस्म को जो व्यक्ति अपने शरीर में लगाएगा उसे शुभ  फल प्राप्त होगा ,ऐसा  अनेक पुराणों  में वर्णित हैं। 

होली त्यौहार उत्तर  भारत  में विशेष  रूप से मनाया जाता है। भारत के अनेक प्रांतो में लोंग होली विभिन्न रूप से मानते हैं,साथ ही यह त्यौहार नई  फसल होने  कि खुशी  में भी मनाया जाता  हैं। 

यह कथा इस बात का संकेत देती है कि ,आज भी सच्चाई कि जीत होती है।

आज भी पूर्णिमा के दिन होलिका दहन किया जाता हैं और अगले दिन सब लोंग एक दूसरे पर रंग डालते है और गुलाल लगाते  है। यह रंगो का त्यौहार है इस दिन लोंग  अपने दोस्तों रिश्तेदारों के साथ जमकर होली खेलते हैं। 
होली के दिन घर कि महिलाएं तरह तरह के व्यंजन बनाती  हैं ,जिसमें गुजिया ,मालपुआ,कांजी ,ठंडाई बेहद स्पेशल खानपान हैं। शाम को सभी स्नान करके नए वस्त्र पहन कर नाते रिश्तेदारों  से मिलने जाते हैं ,साथ ही खूब नाच गाना होता है। 

ब्रज की होली ,मथुरा की  होली ,वृंदावन की  होली ,बरसाने की होली ,काशी  कि होली पुरे उत्तर भारत में मशहूर है। होली उत्सव मनाने के लिए देशी विदेशी पर्यटक भी ब्रज पहुचते हैं ,सब मिलकर इस उत्सव का लुत्फ़ उठाते  हैं। 
--सुगंधा झा 

Thursday, 6 March 2014

बदहाल प्रदेश (उत्तर प्रदेश )


उत्तर प्रदेश में सपा सरकार के आने का एक ही कारण था ,बसपा के राज से छुटकारा। आज उत्तर परदेश में अपराधियों  के हौसले बुलंद है। परंतु सपा सरकार ने भी जनता कि उम्मीदों को छला हैं। जिन उम्मीदों  के साथ लोगों ने सपा को सत्ता सौपी और युवा मुख्यमंत्री का चुनाव किया कि हो सकता है ,यह प्रदेश में शांति, न्याय व्यवस्था को सुनिश्चित करेंगे ऐसा दीखता नहीं है। 

युवा मुख्यमंत्री के शासन  में उनके अपने ही कार्यकर्ता बेलगाम हो गये ,जिसके चलते राज्य में गुंडागर्दी बढ़ी हैं। 
स्थिति यह है कि अधिकतर अपराधों के तार किसी न किसी रूप से सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़ते  हैं।कभी मुजफ्फरनगर में दंगे तो कभी गन्ना किसानों का आक्रोश ,दंगे के बाद जब हल्ला मचा तो कुछ नेताओं को दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। लेकिन यहा भी प्रदेश सरकार  ने पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाया। अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के खिलाफ कोई ठोश कदम  नहीं उठाए। 

दंगा पीड़ितो को रहत मिले न मिले ,लेकिन सूबे कि सरकार को सैफई  में महोत्सव करना जरुरी था ,तो आधे दर्जन से ज्यादा नेता विदेश दौरे पर रवाना हुए। आज़म खा साहेब कि भैंसे  गुम  हुई, तो प्रदेश के मंत्री साहेब ने s.h.o को लाइन हाज़िर कर दिया। 
हाल ही में  सपा विधायक (इरफ़ान सोलंकी )कि मेडिकल छात्रों के साथ हाथापाई हुई ,तो सरकार ने जांच  का हवाला दिया। 

जिसकी वजह से डॉक्टरों कि हड़ताल हुई ,तीन  दर्जन से ज्यादा लोग वगैर इलाज बे मौत  मर गये ,इसका ज़िम्मेदार कौन हैं ?
मुलायम सिंह हिदायत देते रहते हैं ,अपनी सरकार के मंत्रियों  को जो सिर्फ एक दिखावा हैं, और कुछ नहीं। 

जनता बेवज़ह  ही पुलिस को दोष देती रहती है ,अगर सत्ता ही निरंकुश हो जाए ,तो प्रशासन  क्या करेगा ?
भारत जैसे देश के इतने बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में क्या सत्ता का यही मतलब है। आखिर कैसे नेता बनते ही कुर्सी मिलते ही यह लोग इतने संवेदनहीन हो जाते हैं।
 आज उत्तर प्रदेश कि जो स्थिति है उस जिम्मेदारी से अखिलेश सरकार खुद को बचा नहीं सकती हैं। 
सत्ता नशा का नाम नहीं ,बल्कि ज़िम्मेदारी का नाम हैं।
सुगंधा झा 

Friday, 28 February 2014

"आप से सीखे पार्टियां "

                                                                                                                                                            राजनीती के नए अध्याय कि शुरुआत
''अरविंद केजरीवाल और टीम'' ने किया, जिसमें उनका साथ दिया यहाँ की आम जनता ने, उन्होंने राजनीती में बढ़चढ़ कर भाग लेने के लिए यहाँ के लोंगो में एक जोश का संचार किया। जिससे लोंगो ने सिस्टम को बदलने कि ठान ली, उनकी टीम के चंद युवा चेहरों ने सत्ता के गलियारों में तहलका मचा दिया। कई सालों से सत्ता को अपनी जागीर समझने वाले नेताओं के पैरों तले ज़मीन खिसक गयी।
"आम आदमी पार्टी" में लोंगो को उम्मीद दिखाई दी, इस पार्टी ने पहले दिल्ली में सत्ता आर्जित की, और अब लोकसभा चुनाव पर इसका ध्यान है। पढ़े लिखे वर्ग को राजनीती में आने पर जोर दिया, ''आम आदमी पार्टी'' राजनीती में एक क्रांति लेकर आई है।
जिस तरह से इस पार्टी ने दिल्ली में सरकार बनाई, और चंद दिनों के भीतर ही फैसले लेने शुरू किए थे, कुछ ही समय हुआ की, अस्थायी कर्मचारी और अन्य समस्याओं से परेशान लोग ''अरविंद केजरीवाल'' के पीछे पड़ गए।
क्या इससे से पहले 15  सालों तक सत्ता पर काबिज़ कांग्रेस की मुख्यमंत्री ''शीला जी'' के साथ ऐसा करने की हिम्मत जुटा पाए थे ?
''केजरीवाल'' खुले में सबकी समस्याओं को सुन रहे थे, तो इसका अर्थ यह नहीं की सभी राजनीतिक पार्टियाँ और विपक्षी नेताओं उनके काम में हस्तक्षेप करे।
दूसरी पार्टियाँ तो उन्हें ऐसे तंग कर रही थी कि, जैसे उन्होंने अपने शासन काल में, जनता की भलाई के लिए दिन-रात एक कर दिया हो। सत्ता किसी कि जागीर नहीं यह बात इस पार्टी के लोगों ने साबित कर दिया। आम आदमी पार्टी लोगों के लिए उम्मीद लेकर आई है। लेकिन जिस तरह से इनके नेताओं के साथ दुर्व्यवहार होता है ,तो कभी पार्टी दफ्तर पर तोड़फोड़ होता है ,उससे लगता है कि कुछ शैतानी ताकतें इस पार्टी को आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहती हैं।
सच्चाई यह थी की ''आप'' ने ना तो ख़ुद माल खाया और न ही किसी को ऐसा करने मौक़ा दिया। यही दुःख विपक्षियों को सता रही थी। इसलिए उन्होंने सोचा की किसी तरह से इस रोड़े ''आप'' की सरकार को हटाई जाए। ''आप'' सरकार इसी कुटिल नीति कि भेंट चढ़ गई।
—सुगंधा झा 

Tuesday, 11 February 2014

मुज्ज़फरनगर का दर्द

जलता रहा मुज्ज़फरनगर मरते रहे लोंग ,सभी पार्टी के नेता अफसर  तमाशबीन बनकर सबकुछ देखते रहे। लोंगो को शांत करने के बजाय तमाम नेता जी भड़काऊ भाषण देते रहे ,जिससे दंगा और भडका ,कई गॉव तबाह हुआ ,कितनी मौतों हुई,उस पर भी हमारे देश के नेता राजनितिक रोटिया सेकने से बाज नहीं आए। दंगो को शांत करने के बजाय राज्य और केन्द्र  सरकार एक दूसरे पर दोषारोपण करते रहे ,अभी भी मामले को निपटाने के बजाय उत्तर प्रदेश कि सरकार कि तरफ से कोई ठोस कदम उठते दिखे नहीं ,बल्कि इतने समय बीतने के बाद भी हजारों लोंग अपने छोटे बच्चों को लेकर ठण्ड में मरने को तैयार है ,लेकिन खौफ के चलते अपने घर लौटना नहीं चाहते ,उस पर नेताजी का बेतुका बयान कि , यह लोग विपक्षी पार्टियों के भेजें हुए हैं ,या पाँच  सात लाख मुआवजे के चलते यहा रह रहे है ,कोई नेताजी से यह सवाल पूछता  कि इतनी ठण्ड में  इंसान पैसे के लिए अपनी और अपने बच्चों कि जान के साथ खिलवाड़ क्यों करेगा ? साथ ही उत्तर प्रदेश के मुख्य  सचिव का कहना कि ठण्ड से मौतें होती तो साइबेरिया में कोई नहीं बचता। सचिव साहब सबको पता है, कि ठण्ड से मरने के लिए साइबेरिया जाने  कि जरुरत नहीं है, क्योकि ठण्ड से सबसे ज्यादा मौतें उत्तर भारत में ही होती हैं। जिसमे मौत का अकड़ा उत्तर प्रदेश का सबसे ज्यादा है ,आखिर कैसे हमारे देश के नेता अफसर इतने संवेदनहीन हो जाते हैं ,आम लोंगो कि समझ से परे हैं। जो नेता चुनती है कि ,वह उनका नेतृत्व करेगा ,कुर्सी मिलते ही नेताजी जनता को कुछ नहीं समझते हैं ,हर कदम पर जनता कि उपेक्षा करते है।जहा उत्तर प्रदेश सरकार को मुज्ज़फरनगर को दोबारा बसाना चाहिए था ,वहा नेताजी सैफई में महोत्सव मना रहे थे ,मंत्रियो के  विदेश दौरे पर पैसा लगा रहे थे। यही सरकार प्रदेश के विकास के लिए फण्ड का रोना रोती रहती है। उत्तर प्रदेश में यह कौन सा समाजवाद है समझ नहीं आता हैं। 

Monday, 3 February 2014

"शर्मशार इंसानियत "

जब देश गणतंत्र दिवस कि तैयारियों में मस्त था ,उसी समय पश्चिम बंगाल के बीरभूम में एक बेटी कि इज्जत को बेआबरू किया जा रहा था।                                                                                                               उसके साथ ऐसा बर्ताव सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि  उसका कसूर सिर्फ इतना था कि ,उसने दूसरी जाति के लड़के से शादी कर ली थी। पंचायत के निर्देश पर उस युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया ,जिसने एक बार फिर इंसानियत को शर्मशार कर दिया। किस कानून में इस तरह कि सजा का प्रावधान है ?   और ऐसी सजा सुनाने का हक़ पंचायत को किसने दिया । सचमुच बीरभूम कि इस पंचायत ने तो गणतंत्र के मायने ही बदल दिए। जिस देश कि महिलाओं को कभी सती , सावित्री  का दर्ज दिया जाता था , आज उस देश कि महिलाए और बेटियां कही भी सुरक्षित नहीं है , स्त्री समाज का जीवन नारकीय बन गया है , वह भी चंद समाज के ठेकेदारों कि वजह से।  आखिर किसी भी लड़की के दामन पर दाग लगाने का हक़ इन जैसे लोंगो को किसने दिया है ?                                                       इस तरह कि घटना देख सुन कर लगता है कि ,भारत में भी तालिबानी संस्कृति पनप रही हैं। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए इस तरह कि पंचायत और अपराधियों पर अंकुश लगाने कि सख्त जरुरत है। ऐसी घटनाएं हमारे लोकतंत्र और इंसानियत को बदसूरत बनाती हैं। पश्चिम बंगाल अपनी संस्कृति और परम्परा के लिए जाना जाता था,लेकिन आज हालात कुछ और हैं ,आए दिन यहा कोई न कोई घटना होती है। जिससे ऐसा लगता है कि यहां भी अपराधियों के हौसलें बुलंद होते जा रहे हैं,इस घटना ने सरकार और पुलिस प्रशासन पर प्रशन चिन्ह लगा दिए हैं।                                                                                                                               सुगंधा झा    

Monday, 2 December 2013

आम आदमी के उम्मीदों कि पार्टी

अन्ना हज़ारे के जनलोकपाल के बाद जनसमर्थन से अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाई। क्योंकि  अरविंद को आभास हो गया था कि आंदोलन और भूख हड़ताल से कुछ भी होने वाला नहीं हैं ,भ्रष्टाचार मिटने के लिए सिस्टम के अंदर जाकर ,भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाना बहुत जरुरी हो गया हैं ,इसमें केजरीवाल का साथ दिया मध्यम व  युवा वर्ग ने ,जिनके समर्थन से अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी का निर्माण किया। उनका मकसद जाति आधारित राजनीती करना नहीं है। आज कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है ,जो ,भ्रष्टाचार मुक्त हो। राजनीती पैसा कमाने व ताकत खरीदने का जरिया बन गया है ,नेता नौकरशाह ,उद्योगपतियों  के  बीच ऐसा समझौता बन गया है ,जिसने लोकतंत्र पर अपना कब्ज़ा जमा लिया ,इसकी वजह से आम आदमी का लोकतंत्र से भरोसा उठता जा रहा हैं।"अन्ना ने आंदोलन के दौरान कहा था कि जनता मालिक है और राजनेता सेवक ,लेकिन आज के हालात में मालिक सेवक हो गया है ,और सेवक मालिक बन बेठा है मौजूदा हालत में राजनीती जनता के नाम पर होती है लेकिन जीत के बाद जनता ही भुला दी जाती है। यह बात अरविंद बखूबी जान  चुके थे कि अब सिस्टम में बदलाव जरुरी हो गया हैं ,इसी एहसास ने लोंगो को सड़क पर उतरने और अरविंद का साथ देने पर मजबूर कर दिया। अन्ना के आंदोलन ने लोंगो को राजनीती का आइना दिखने का काम किया। आज दिल्ली में आम आदमी पार्टी लोंगो को एक उम्मीद का रास्ता दिखा रही है ,इसलिए दिल्ली विधानसभा चुनाव में खतरा दोनों पार्टी (कांग्रेस ,और  भारतीय जनता पार्टी ) को अपनी जमीन खिसकती दिख रही है। देखना है कि अरविंद के समर्थन में उठी आवाजें वोट में परिवर्तित हो पाती हैं या नहीं ?लेकिन जनता कि उम्मीदें जरुर इस पार्टी से हैं कि यह उनके हक़ में काम करेगी।
--सुगंधा झा